होर्मुज संकट के बीच भारत ने बढ़ाया ऊर्जा और रक्षा आत्मनिर्भरता पर फोकस
नई दिल्ली: वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों, विशेषकर रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के तनाव ने अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। व्यापारिक मार्ग अब केवल आर्थिक लेन-देन का माध्यम न रहकर भू-राजनीतिक हथियारों में तब्दील हो गए हैं। इस बदलते परिवेश में, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में संभावित बाधाओं ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक तैयारियों के सामने नई चुनौतियां पेश कर दी हैं। भारत अपनी तेल और गैस आवश्यकताओं के लिए एक बड़े आयात मार्ग पर निर्भर है, जहाँ ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता रणनीतिक टकराव कीमतों और आपूर्ति में अस्थिरता पैदा कर सकता है।
ऊर्जा आत्मनिर्भरता की बढ़ती आवश्यकता
मौजूदा संकट ने भारत के लिए ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। चूंकि भारत की ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी संवेदनशील समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है, इसलिए किसी भी प्रकार की नाकाबंदी भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति भारत को अपनी ऊर्जा नीतियों पर पुनर्विचार करने और घरेलू विकल्पों को तेजी से विकसित करने का एक कड़ा संदेश दे रही है, ताकि भविष्य में होने वाले किसी भी वैश्विक झटके से देश को सुरक्षित रखा जा सके।
रक्षा विनिर्माण और नीतिगत बदलाव
आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली बाधाओं ने रक्षा क्षेत्र में विदेशी निर्भरता को कम करने की दिशा में भी एक बड़ा मोड़ ला दिया है। सरकार इस रणनीतिक कमजोरी को दूर करने के लिए 'डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर' (DAP 2020) और आगामी DAP 2026 जैसे ठोस कदम उठा रही है। निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन और निवेश नियमों में ढील देने के कारण देश में हथियारों के उत्पादन और निर्यात, दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। यह कदम न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत कर रहे हैं, बल्कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को भी सुनिश्चित कर रहे हैं।
आर्थिक विकास और औद्योगिक गलियारे
रक्षा उत्पादन के विस्तार का सबसे सकारात्मक प्रभाव देश के एमएसएमई (MSME) सेक्टर और तकनीकी नवाचार पर पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में विकसित हो रहे डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर डिजाइन और उत्पादन के नए केंद्रों के रूप में उभर रहे हैं, जिससे रोजगार के व्यापक अवसर पैदा हो रहे हैं। हालांकि, पूर्ण आत्मनिर्भरता की यह राह जटिल है और इसके लिए निरंतर नीतिगत सुधारों तथा अनुसंधान में निवेश की आवश्यकता होगी। फिर भी, एक सुदृढ़ घरेलू रक्षा और ऊर्जा ढांचा तैयार करना भारत के दीर्घकालिक आर्थिक और सामरिक हितों के लिए अनिवार्य हो गया है।

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